सद्भाव का संदेशः वंदे मातरम् पर बहस
भारत को नयी ऊर्जा से भरे राष्ट्रीय उद्देश्य के साथ सामाजिक एकता बनाये रखनी होगी
वंदे मातरम्, मां के रूप में भारत के वंदन, ने ब्रिटिश उपनिवेश से आजादी की लड़ाई में समाज के विभिन्न तबकों को साथ लाने वाले राष्ट्र-निर्माताओं की पीढ़ियों को प्रेरित किया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित और 1880 के दशक के शुरू में उनके उपन्यास आनंदमठ के साथ प्रकाशित इस गीत की यह 150वीं वर्षगांठ है। राष्ट्रीय आंदोलन की अगुवाई कर रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं ने सन 1937 में तय किया कि उसकी सभाओं में इसके प्रथम दो अंतरे इस्तेमाल किये जायेंगे। और, आधुनिक भारतीय गणराज्य के संविधान ने इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्रदान किया। यह बिल्कुल वाजिब है कि देश इस गीत की कहानी, इसकी भावना, और राष्ट्र-निर्माण में इसके मकसद को याद कर रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस गीत की सालगिरह के उपलक्ष्य में संसदीय चर्चा दलगत जुबानी जंग में बदल गयी जिसमें पुराने जख्मों को कुरेदा गया और भुलाये जा चुके गिले-शिकवों को नया रूप दिया गया। भाजपा ने, लोकसभा में प्रधानमंत्री और राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में, इस बिंदु पर जोर देने का प्रयास किया कि इस गीत के केवल प्रथम दो अंतरे इस्तेमाल करने के कांग्रेस के निर्णय ने विभाजन के बीज बोये और मुस्लिम लीग ने अलग पाकिस्तान राष्ट्र के लिए समर्थन जुटाया। विपक्ष ने, लोकसभा में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा और राज्यसभा में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की अगुवाई में, इस गीत की भूमिका की ऐतिहासिक परिस्थितियों को समझाया और वंदे मातरम् पर किसी बहस की जरूरत पर ही सवाल खड़ा किया। प्रियंका ने कहा कि अतीत पर चर्चा करने के बजाय संसद को वर्तमान के उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं।
एक राष्ट्रीय समुदाय के वर्तमान के लिए अतीत अहम है, लेकिन इतिहास से सही सबक लेना अहम है ताकि गलतियां दोहराने से बचा जा सके। राष्ट्रीय आंदोलन ने विभिन्न धार्मिक व भाषाई समुदायों और संप्रदायों के बीच एकता राजनीतिक स्पेस के विस्तार के जरिए बनायी जिसे वे सब साझा कर सकते थे। दरअसल, वंदे मातरम् की कहानी सामंजस्य और परस्पर सम्मान के उस रास्ते का ही समर्थन करती है जो विभिन्न आस्थाओं और समुदायों को जोड़ता है। राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने सोचा कि अक्लमंदी साझा आधारभूमि खोजने में है, न कि किसी आस्था को थोपने में। हिंदुओं के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हुए, पूरे देश में करोड़ों मुस्लिम वंदे मातरम् के घोष में शामिल हुए। एकजुटता की परियोजना बहुत हद तक सफल रही, लेकिन विभाजन ने उस एकता की नाजुक प्रकृति को दिखाया और भविष्य के लिए इस चिंता को सामने रखा कि एक धर्मनिरपेक्ष, संवैधानिक भारतीय साझेपन के अलावा किसी पहचान को बढ़ावा देना खतरनाक हो सकता है, चाहे वक्त कोई भी हो। सद्भाव के इतिहास को उलट कर दरार का कारण बनाने से कोई मकसद हल नहीं होगा। भारत को नयी ऊर्जा से भरे राष्ट्रीय उद्देश्य के साथ एकता और सद्भाव को बनाये रखना होगा। जो वास्तव में भारत माता का सबसे बड़ा वंदन है।
इस सप्ताह की कच्छ की प्रमुख खबरें
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मौसम अपडेट
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- राज्य में इस वर्ष बारिश और अतिवृष्टि के कारण 136 लोगों की मौत
- राजकोट की हवा प्रदूषित हो गई
- 10.4 डिग्री के साथ कंडला सबसे ठंडा स्थान
- मॉर्निंग न्यूज ब्रीफ
- अहमदाबाद पूर्व क्षेत्र को मिलेगी बड़ी राहत
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- मानसून में नुकसान का अंदेशा केंद्रीय टीम को
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- ठंड शुरू होने से अहमदाबाद में संक्रमण बढ़े
- आज भी नलिया 11 डिग्री के साथ सबसे ठंडा
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